अबूझमाड़ की देवगुड़ी परंपरा: प्रकृति ही ईश्वर, बिना मूर्ति होती है पूजा
बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का अबूझमाड़ क्षेत्र अपनी घनी वन संपदा, दुर्गम पहाड़ियों और विशिष्ट आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां माड़िया और मुड़िया जनजातियों की ‘देवगुड़ी’ परंपरा आज भी आस्था, सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति संरक्षण से जुड़ी हुई है। नईदुनिया की रिपोर्ट के अनुसार, यह परंपरा करीब एक हजार साल पुरानी बताई जाती है।
भव्य मंदिर नहीं, प्रकृति के बीच आस्था का केंद्र
देवगुड़ी सामान्य मंदिरों से अलग होती है। यहां न तो ऊंचे शिखर वाले मंदिर दिखाई देते हैं और न ही भगवान की बड़ी पत्थर या सीमेंट की मूर्तियां। गांव के बाहर या जंगल के बीच लकड़ी और घास-फूस से बनी साधारण जगह को देवगुड़ी के रूप में स्थापित किया जाता है।
देवताओं को यहां निराकार माना जाता है। उनकी उपस्थिति का प्रतीक लकड़ी के खंभे, मिट्टी से बने घोड़े-हाथी, त्रिशूल, लोहे की सांकल या विशेष पत्थर हो सकते हैं।
आंगा देव की अनोखी मान्यता
अबूझमाड़ की परंपरा में ‘आंगा देव’ का विशेष महत्व है। किसी संकट या नए देवता की स्थापना के समय जंगल से बीजा या सरई की पवित्र लकड़ी चुनी जाती है। कई लकड़ियों को जोड़कर पालकी जैसी आकृति बनाई जाती है। पूजा-अनुष्ठान के बाद मान्यता होती है कि इसमें देवता का वास हो जाता है।
त्योहारों और विशेष अवसरों पर आंगा देव को कंधों पर उठाकर गांव में ले जाया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, आंगा देव गांव के महत्वपूर्ण मामलों में मार्गदर्शन करते हैं।
देवगुड़ी के आसपास जंगल की सुरक्षा
देवगुड़ी केवल धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि इसके साथ प्रकृति संरक्षण की परंपरा भी जुड़ी हुई है। देवगुड़ी के आसपास के जंगल को ‘देवराही’ कहा जाता है। इस क्षेत्र में पेड़ों की कटाई और शिकार पर रोक रहती है।
स्थानीय आस्था में जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को देवताओं से जोड़ा गया है। इसी कारण जंगल को सुरक्षित रखने के लिए धार्मिक और सामाजिक नियम बनाए गए हैं।
पहली उपज देवता को अर्पित करने की परंपरा
देवगुड़ी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा नई फसल और जंगल से मिलने वाली पहली उपज को देवता को अर्पित करने की है। नया अनाज, महुआ या आम जैसी उपज पहले देवगुड़ी में चढ़ाई जाती है। इसके बाद ही ग्रामीण उसका सेवन करते हैं।
स्थानीय धार्मिक व्यवस्था में आंगा पेन, बूढ़ादेव और माटी देव जैसे देवताओं की मान्यता बताई गई है।
गायता और सिरहा की महत्वपूर्ण भूमिका
देवगुड़ी की धार्मिक व्यवस्था में गायता और सिरहा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गायता गांव का धार्मिक प्रमुख होता है और पूजा-अनुष्ठान से जुड़े कार्यों को पूरा करता है।
वहीं सिरहा को ऐसी धार्मिक भूमिका वाला व्यक्ति माना जाता है जिसके माध्यम से देवता की उपस्थिति व्यक्त होने की मान्यता है। स्थानीय परंपरा में सिरहा से बीमारी, प्राकृतिक आपदा और सामाजिक विवाद जैसे मामलों में मार्गदर्शन लिया जाता है।
सामाजिक विवादों के समाधान का भी केंद्र
देवगुड़ी का महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीणों के लिए सामाजिक चर्चा और सामुदायिक निर्णय का स्थान भी रही है। रिपोर्ट के अनुसार, कई पारिवारिक और सामाजिक विवादों को पहले समुदाय के स्तर पर देवगुड़ी में रखा जाता है और वहां परंपरागत तरीके से समाधान तलाशने की कोशिश की जाती है।
महिलाओं के प्रवेश को लेकर अलग-अलग परंपराएं
कुछ देवगुड़ियों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर पारंपरिक प्रतिबंध बताए गए हैं। रिपोर्ट में इसे मासिक धर्म से जुड़े स्थानीय धार्मिक नियमों से जोड़ा गया है। हालांकि, ऐसे नियम अलग-अलग देवगुड़ियों और समुदायों में भिन्न हो सकते हैं।
परंपरा को संरक्षित करने की कोशिश
आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच देवगुड़ी जैसी पारंपरिक व्यवस्थाओं को संरक्षित करने की कोशिश भी की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में देवगुड़ी संरक्षण योजना के तहत इनके मूल प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखते हुए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।
अबूझमाड़ की देवगुड़ी परंपरा इस बात का उदाहरण है कि आदिवासी समाज में धार्मिक आस्था, सामुदायिक जीवन और प्रकृति संरक्षण लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं।










