छत्तीसगढ़ में 31 स्थलों पर विकसित होगा राम वनगमन पथ, 2029 तक तीन चरणों में पूरा होगा काम; आश्रय स्थल, सत्संग भवन और सीता रसोई बनेंगे
रायपुर। छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम के वनवास मार्ग से जुड़े स्थलों को विकसित करने की योजना को राज्य सरकार नए सिरे से आगे बढ़ा रही है। राम वनगमन पर्यटन परिपथ के तहत प्रदेश के 31 स्थलों का तीन चरणों में विकास किया जाएगा। योजना को वर्ष 2028-29 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इन स्थलों पर साधु-संतों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए आश्रय स्थल, सत्संग के लिए भवन और भोजन की व्यवस्था के लिए सीता रसोई बनाई जाएगी।
राज्य सरकार का कहना है कि इन स्थलों का चयन शोध के आधार पर किया गया है। योजना का उद्देश्य धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
तीन चरणों में होगा विकास कार्य
राम वनगमन पथ के विकास के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27, 2027-28 और 2028-29 में अलग-अलग चरणों में काम प्रस्तावित है। पहले चरण में 2026-27 के दौरान 10 स्थलों, दूसरे चरण में 2027-28 के दौरान 11 स्थलों और तीसरे चरण में 2028-29 के दौरान 10 स्थलों का विकास किया जाएगा।
परियोजना के तहत छत्तीसगढ़ के उत्तर से दक्षिण तक विभिन्न क्षेत्रों में स्थित धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को शामिल किया गया है। इससे सरगुजा, मध्य छत्तीसगढ़ और बस्तर क्षेत्र के कई स्थानों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की योजना है।
पहले चरण में इन स्थलों का होगा विकास
वर्ष 2026-27 के पहले चरण में रुद्रेश्वर महादेव मंदिर (रुद्री, धमतरी), श्रृंगी ऋषि-सप्तर्षि आश्रम (नगरी-सिहावा), खरौद, रामाराम, चिंतामीटर मंदिर (सुकमा), रामगढ़, सीता बेंगरा, रामझरना (रायगढ़), विष्णु मंदिर (रामपुर-जुनवानी, कांकेर), चित्रकोट शिव मंदिर और सीतामढ़ी-हरचौका जैसे स्थलों को विकसित करने की योजना है।
इन स्थानों पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे और पर्यटन सुविधाओं का विकास किया जाएगा।
दूसरे और तीसरे चरण में भी होंगे विकास कार्य
वर्ष 2027-28 के दूसरे चरण में राम-लक्ष्मण पायन, सीतामढ़ी-छतोड़ा, सीतामढ़ी-रापा, सीतामढ़ी-कनवाई, सीता लेखनी, सीताकुंड, राम-जानकी मंदिर (सारासोर), पैसर घाट, गड़िया मंदिर, छोटे डोंगर शिव मंदिर तोडमा और सूरजपुर स्थित राम मंदिर सहित अन्य स्थलों को शामिल किया गया है।
वहीं, वर्ष 2028-29 के तीसरे चरण में इंजराम शिव मंदिर, सिंगेश्वर, लोमश ऋषि आश्रम, विष्णु मंदिर, कुलेश्वर मंदिर, तीरथगढ़, सीताकुंड, मांडव्य आश्रम, शिवरीनारायण, वाल्मीकि आश्रम, वागेश्वर शिव मंदिर, रक्सा डोंगरी और सिरपुर के राम दिवाला सहित विभिन्न स्थलों के विकास का प्रस्ताव है।
दो शोधों के आधार पर हुआ स्थलों का चयन
राज्य सरकार के अनुसार, राम वनगमन पथ के लिए स्थलों का चयन दो शोधों के आधार पर किया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ के इतिहासकार स्वर्गीय हेमू यदु की वर्ष 2018 में प्रकाशित पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ पर्यटन में राम वनगमन पथ’ और पंडित राम अवतार शर्मा का अध्ययन शामिल है। राम अवतार शर्मा ने अयोध्या से श्रीलंका तक भगवान श्रीराम के वनगमन मार्ग का अध्ययन किया था, जिसमें देशभर के 240 से अधिक स्थलों का उल्लेख बताया गया है।
सरकार का कहना है कि इन अध्ययनों के आधार पर छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़े माने जाने वाले स्थलों को चिह्नित किया गया है।
चंद्रखुरी को लेकर भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
राम वनगमन पथ के लिए 31 स्थलों के चयन के बाद प्रदेश में राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने राम वनगमन पर्यटन परिपथ के तहत 75 स्थलों की पहचान कर विकास की पहल की थी। इनमें चंद्रखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर, शिवरीनारायण, सीतामढ़ी-हरचौका, रामगढ़, राजिम, नगरी-सिहावा, रामाराम, तुरतुरिया और चंपारण सहित नौ प्रमुख स्थलों पर विकास कार्य शुरू किए गए थे।
वर्तमान भाजपा सरकार की ओर से घोषित 31 स्थलों की सूची में चंद्रखुरी का नाम शामिल नहीं होने पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। वहीं, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने स्थलों के चयन को शोध से जुड़ा निर्णय बताते हुए कहा है कि जिन स्थानों का उल्लेख किसी ग्रंथ में नहीं है, उन्हें लेकर सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने अधूरे विकास कार्यों को भी पूरा करने की बात कही है।
धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की तैयारी
राम वनगमन पथ के विकास से प्रदेश के धार्मिक स्थलों पर आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलने की उम्मीद है। आश्रय स्थल, सत्संग भवन और सीता रसोई जैसी व्यवस्थाओं से साधु-संतों और पर्यटकों को ठहरने तथा भोजन की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर धार्मिक गतिविधियों और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
अब इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित निर्माण कार्य निर्धारित समयसीमा में कितनी तेजी से पूरे होते हैं और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं किस स्तर पर विकसित की जाती हैं।











