बिलासपुर में आयुर्वेद के शोध से मोबाइल और रील्स की लत छुड़ाने की नई पहल, 60 दिन की काउंसलिंग से स्क्रीन टाइम में आई कमी
बिलासपुर। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और छोटी-छोटी वीडियो रील्स देखने की बढ़ती आदत युवाओं की मानसिक सेहत के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। देर रात तक मोबाइल चलाना, लगातार स्क्रीन पर समय बिताना और अपनी दिनचर्या को नजरअंदाज करना युवाओं के जीवन को प्रभावित कर रहा है। इस समस्या के समाधान की दिशा में बिलासपुर स्थित शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय में किए गए शोध से सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। यहां बिना दवा के 60 दिनों तक काउंसलिंग और जीवनशैली में बदलाव के माध्यम से विद्यार्थियों के स्क्रीन टाइम और अवसाद के स्तर में कमी दर्ज की गई।
आयुष मंत्रालय की शोध परियोजना में मिली राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अधीन केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद की विद्यार्थी शोध योजना के अंतर्गत बिलासपुर के शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय की छात्रा कीर्ति यदु ने यह शोध किया। बीएएमएस द्वितीय वर्ष की छात्रा कीर्ति यदु ने रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अमित नामपल्लीवार के मार्गदर्शन में परियोजना पूरी की। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. जीआर चतुर्वेदी का भी इसमें सहयोग रहा।
शोध की अंतिम रिपोर्ट को राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट श्रेणी प्रदान की गई। इस उपलब्धि को युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत और उससे जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
200 विद्यार्थियों की जांच के बाद 35 को अध्ययन में किया शामिल
शोध के दौरान महाविद्यालय के 200 विद्यार्थियों की जांच की गई। इनमें से मानसिक समायोजन संबंधी विकार के लक्षण पाए जाने वाले 35 विद्यार्थियों को 60 दिनों के अध्ययन में शामिल किया गया। अध्ययन में शामिल विद्यार्थियों में 73 प्रतिशत छात्राएं थीं। इनमें प्रथम वर्ष के 20 से 22 वर्ष की आयु वाले विद्यार्थियों की संख्या अधिक रही।
अध्ययन को संस्थागत नैतिकता समिति की स्वीकृति के बाद भारतीय नैदानिक परीक्षण पंजी में दर्ज कराया गया। शोध के दौरान विद्यार्थियों को कोई दवा नहीं दी गई। इसके बजाय आयुर्वेद की सत्वावजया चिकित्सा और आधुनिक तार्किक भावनात्मक व्यवहार चिकित्सा के समन्वय से परामर्श दिया गया। प्रत्येक 15 दिन में काउंसलिंग सत्र आयोजित किए गए, ताकि विद्यार्थी अपनी आदतों को समझ सकें और उनमें सुधार कर सकें।
औसत स्क्रीन टाइम 5.63 घंटे से घटकर 3.48 घंटे हुआ
शोध के दौरान विद्यार्थियों को मोबाइल का अनावश्यक इस्तेमाल कम करने और दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, अध्ययन शुरू होने से पहले विद्यार्थियों का औसत दैनिक स्क्रीन टाइम 5.63 घंटे था, जो 60 दिनों के बाद घटकर 3.48 घंटे रह गया।
इसी अवधि में अवसाद मापांक का औसत स्तर भी 15.93 से घटकर 7.5 दर्ज किया गया। ये परिणाम काउंसलिंग, आत्मसंयम और जीवनशैली में बदलाव के साथ सकारात्मक परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं। हालांकि, इन परिणामों की व्यापक पुष्टि के लिए आगे और शोध की आवश्यकता है।
डिजिटल उपवास और योग को बनाया दिनचर्या का हिस्सा
शोध में शामिल विद्यार्थियों को मोबाइल से दूरी बनाने के लिए कई व्यावहारिक उपाय अपनाने की सलाह दी गई। इनमें डिजिटल उपवास, सोने के कमरे को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मुक्त रखना, भ्रामरी प्राणायाम, योग निद्रा और नियमित दिनचर्या शामिल थे।
विद्यार्थियों को निश्चित समय तक मोबाइल से दूर रहने, देर रात तक जागने की आदत छोड़ने और अपने दैनिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया गया। काउंसलिंग के दौरान उन्हें यह समझने में मदद की गई कि मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत कब जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है और किस तरह उस पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
### आयुर्वेद के प्रज्ञापराध सिद्धांत से समझी गई डिजिटल लत
शोध के मार्गदर्शक डॉ. अमित नामपल्लीवार ने आयुर्वेद के प्रज्ञापराध सिद्धांत के माध्यम से डिजिटल लत को समझाया। इस सिद्धांत के अनुसार, हानिकारक परिणामों की जानकारी होने के बावजूद किसी गलत व्यवहार को लगातार दोहराना बौद्धिक भूल की श्रेणी में आता है।
मोबाइल की लत के मामले में व्यक्ति को यह पता होने के बावजूद कि लगातार स्क्रीन देखने और देर रात तक जागने से उसकी दिनचर्या प्रभावित हो रही है, वह इस आदत को रोक नहीं पाता। ऐसे में आत्मसंयम विकसित करना, अपनी आदतों को पहचानना और नियमित दिनचर्या अपनाना महत्वपूर्ण हो जाता है।
### रक्त जांच में भी कुछ बदलाव दर्ज
शोध के दौरान मानसिक स्वास्थ्य के साथ रक्त के कुछ मापदंडों की भी जांच की गई। रिपोर्ट में श्वेत रक्त कोशिकाओं से संबंधित कुछ मापदंडों में बदलाव दर्ज होने का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन बदलावों को केवल काउंसलिंग का परिणाम मानने से पहले अधिक प्रतिभागियों के साथ आगे अध्ययन और वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी है।
बिलासपुर में किया गया यह शोध युवाओं में बढ़ती स्क्रीन और सोशल मीडिया की लत से निपटने के लिए काउंसलिंग, योग, आयुर्वेद और बेहतर जीवनशैली के समन्वय की संभावनाओं को सामने लाता है।











