दीपावली पर चार करोड़ मिट्टी के दीयों से रोशन होंगे दुर्ग-भिलाई, जेवरा सिरसा के 175 कुम्हार परिवार दिन-रात जुटे
दुर्ग। दीपावली के त्योहार को लेकर दुर्ग-भिलाई सहित आसपास के क्षेत्रों में तैयारियां तेज हो गई हैं। बाजारों में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ने के साथ ही कुम्हार परिवारों का काम भी तेज हो गया है। दुर्ग जिला मुख्यालय से करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित ग्राम जेवरा सिरसा की कुम्हार बस्ती में इन दिनों दीपावली के लिए बड़ी संख्या में मिट्टी के दीये तैयार किए जा रहे हैं। इस गांव के करीब 175 कुम्हार परिवार दीये बनाने के काम में जुटे हुए हैं। कुम्हार समाज के अनुसार, त्योहार के दौरान दुर्ग-भिलाई के बाजारों में करीब चार करोड़ दीयों की खपत होती है।
सुबह से देर रात तक दीये बनाने में जुटे परिवार
जेवरा सिरसा गांव की कुम्हार बस्ती में इन दिनों घरों के आंगन, कमरों और छतों पर मिट्टी के दीयों के ढेर नजर आ रहे हैं। दीपावली के लिए अधिक से अधिक दीये तैयार करने के उद्देश्य से परिवार के पुरुषों के साथ महिलाएं भी काम में हाथ बंटा रही हैं। चाक पर दीये बनाने से लेकर उन्हें सुखाने और बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया में परिवार के सदस्य लगातार जुटे हुए हैं।
करीब 10 हजार की आबादी वाले इस गांव में 175 कुम्हार परिवार दीये बनाने का काम करते हैं। गणेशोत्सव के बाद से ही दीपावली के लिए दीये तैयार करने का काम शुरू हो जाता है। गांव के अधिकांश परिवारों के पास चार से पांच चाक हैं। एक परिवार पांच चाक की मदद से दिनभर में करीब 10 हजार दीये तैयार कर सकता है।
मनोज कुंभकार को मिला 25 लाख दीयों का ऑर्डर
गांव के कुम्हार मनोज कुंभकार का परिवार भी दीपावली के लिए बड़े पैमाने पर दीये तैयार कर रहा है। उनके परिवार में पत्नी, बेटे और बहू सहित पांच लोग इस काम में लगे हुए हैं। मनोज कुंभकार के मुताबिक, उन्हें इस सीजन में 25 लाख दीये बनाने का ऑर्डर मिला था, जिसे वह पूरा कर भेज चुके हैं।
मनोज ने बताया कि उनका परिवार सालभर मिट्टी के दीये बनाने का काम करता है। दुर्ग और भिलाई के व्यापारी गांव में पहुंचकर कुम्हारों से सीधे दीये खरीदते हैं। इसके बाद इन दीयों को स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है।
गांव में करीब 25 परिवार ऐसे भी हैं, जो सालभर मिट्टी के दीये बनाने के साथ कलश, मटका, करवा, नांदी, ज्योत कलश और जांता-पोरा जैसी पारंपरिक मिट्टी की वस्तुएं तैयार करते हैं।
42 साल से गांव में दीये खरीद रहे व्यापारी
जेवरा सिरसा की कुम्हार बस्ती से दुर्ग-भिलाई के व्यापारियों का पुराना जुड़ाव है। भिलाई के व्यापारी सुरेश चंद्र पिछले 42 वर्षों से यहां आकर दीये खरीद रहे हैं। उन्होंने बताया कि गांव के अलग-अलग कुम्हार परिवारों से व्यापारी बड़ी संख्या में दीये खरीदते हैं।
व्यापारियों के अनुसार, पोरा त्योहार के आसपास से ही दीयों का बाजार शुरू हो जाता है, जो देवउठनी एकादशी तक चलता है। दीपावली के अलावा छठ और देव दीपावली जैसे त्योहारों पर भी मिट्टी के दीयों की अच्छी मांग रहती है।
35 हजार दीयों का ऑर्डर लेने पहुंचे व्यापारी
दुर्ग के धमधा नाका निवासी तुलसी राम ढीमर ने इस सीजन में 35 हजार दीयों का ऑर्डर दिया था। वह गुरुवार को ऑर्डर लेने के लिए गांव पहुंचे। तुलसी राम के मुताबिक, वह हर साल दीपावली के दौरान दीये बेचते हैं और इस सीजन में करीब 50 हजार दीये बेचने का लक्ष्य रखते हैं।
कुम्हार समाज के संरक्षक सतीश कुंभकार के अनुसार, दीपावली के दौरान बस्ती के कुम्हार परिवार दीये बनाने में पूरी तरह जुट जाते हैं। दुर्ग-भिलाई के बाजारों में ही करीब चार करोड़ मिट्टी के दीयों की खपत होने का अनुमान है।
पारंपरिक कारीगरी से जुड़े हैं सैकड़ों लोगों के रोजगार
जेवरा सिरसा के कुम्हार परिवारों के लिए दीपावली केवल त्योहार नहीं, बल्कि साल की कमाई का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग से पारंपरिक कारीगरी को बढ़ावा मिलता है और स्थानीय व्यापारियों को भी कारोबार का अवसर मिलता है।
दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीयों की खरीद-बिक्री से गांव की अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है। वहीं, पीढ़ियों से चली आ रही कुम्हारों की यह पारंपरिक कला आज भी लोगों के घरों को रोशन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।











