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नगर निगम कोरबा की “इको-स्टेप” योजना से गार्डन बने ग्रीन हट, गर्मी में सुकून तलाशने उमड़ रही लोगों की भीड़

 

कोरबा। नगर पालिक निगम कोरबा की अभिनव “इको-स्टेप” बैंकर्स ग्रीन एप्रोच योजना अब शहर में सकारात्मक बदलाव की मिसाल बनती जा रही है। तपती गर्मी के बीच शहरवासी अब हरियाली और ठंडे वातावरण की तलाश में निगम के उद्यानों का रुख कर रहे हैं। सुबह-शाम इन गार्डनों में लोगों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है, जहां लोग परिवार के साथ समय बिताने, वॉकिंग, योग और प्राणायाम कर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।

निगम के उद्यान अब “ग्रीन हट” का स्वरूप लेते नजर आ रहे हैं। घने पेड़-पौधे, हरी घास और स्वच्छ वातावरण लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। घंटाघर-निहारिका मार्ग स्थित स्मृति उद्यान इसका प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है।

इस योजना का शुभारंभ 4 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ शासन के प्रमुख सचिव एवं कोरबा जिला प्रभारी सचिव रोहित यादव और महापौर संजुदेवी राजपूत ने किया था। योजना के तहत निगम ने शहर के प्रमुख उद्यानों के संचालन, संरक्षण और संधारण की जिम्मेदारी विभिन्न बैंकों को सौंपी है। बैंक अपने सीएसआर फंड से उद्यानों में सुविधाएं विकसित कर रहे हैं और बदले में वहां अपने ब्रांडिंग बोर्ड लगाकर स्वच्छता व पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।

 

नगर निगम ने पांच प्रमुख उद्यानों को अलग-अलग बैंकों को सौंपा है। इसमें एचडीएफसी बैंक को स्मृति उद्यान, महाराष्ट्र बैंक को पुष्पलता उद्यान, इंडियन ओवरसीज बैंक को साडा कॉलोनी शिव मंदिर उद्यान, आईडीएफसी बैंक को महाराणा प्रताप उद्यान और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को रविशंकर नगर उद्यान की जिम्मेदारी दी गई है।

 

नगर निगम आयुक्त आशुतोष पाण्डेय के नेतृत्व में शहर में स्वच्छता, सौंदर्यीकरण और हरियाली बढ़ाने के लिए लगातार कार्य किए जा रहे हैं। सड़क डिवाइडरों और रोड साइड में पौधरोपण के साथ-साथ उद्यानों को विकसित कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में योजनाबद्ध तरीके से काम किया गया है। इसका असर अब शहर में साफ दिखाई देने लगा है।

 

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग के लोग इन उद्यानों का आनंद ले रहे हैं। गर्मी के मौसम में हरियाली से भरपूर यह वातावरण लोगों को राहत और सुकून दे रहा है।

 

वहीं, इस योजना से नगर निगम को आर्थिक लाभ भी हो रहा है। पहले इन उद्यानों के रखरखाव पर निगम को हर साल करीब 50 लाख रुपये खर्च करने पड़ते थे, लेकिन अब बैंकों को जिम्मेदारी सौंपे जाने से निगम को प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख रुपये की बचत हो रही है, साथ ही उद्यानों की व्यवस्थाएं भी बेहतर हुई हैं।

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